Who is the true god.
Who is the true god.
प्रमाण -1. पवित्र यजुर्वेद अध्याय 29 मंत्र 25-
अनुवादः- आज अर्थात वर्तमान में शरीर रूपमहल में दुराचार पूर्वक झूठी पूजा में लीन मननशील व्यक्तियों को लगाई हुई आग अर्थात शास्त्र विधि रहित वर्तमान पूजा जो हानिकारक होती हैं, अग्नि जलाकर भस्म कर देती हैं ऐसे साधक का जीवन शास्त्र विरुद्ध साधना नष्ट कर देती हैं। उसके स्थान पर देवताओं के देवता पूर्ण परमात्मा सत्पुरुष की वास्तविक पूजा है। दयालु जीव का वास्तविक साथी पूर्ण परमात्मा के स्वस्थ ज्ञान अर्थात भक्ति को संदेश वाहक रूप में लेकर आने वाला तथा बोध कराने वाला आप कविर्देव अर्थात कबीर परमेश्वर कबीर है।
भावार्थ:- जिस समय भक्त समाज को शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण पूजा कराया जा रहा होता है । उस समय कविर्देव (कबीर परमेश्वर) तत्वज्ञान को प्रकट करता है।
प्रमाण-2. सामवेद अध्याय नंबर 4 खंड नंबर 25 का श्लोक नंबर 8 -
अनुवादः- पूर्ण समर्थ कबीर देव अर्थात कबीर परमेश्वर विशाल शक्ति युक्त अर्थात सर्वशक्तिमान है तेजपुंज का शरीर मायावती बनाकर प्रकट होकर अर्थात अवतार धारण कर अपने सत्य शब्द वह सत्यनाम रूपी शस्त्र से काल ब्रह्म के पाप रूपी बंधन रूपी किले को तोड़ने वाला, टुकड़े टुकड़े करने वाला सर्व सुखदायक परमेश्वर सर्वर जगत के सर्व प्राणियों को मनसा वाचा कर्मणा अर्थात पूर्ण निष्ठा के साथ अनन्य मन से धार्मिक कर्मों द्वारा सत्य भक्ति से स्तुति उपासना करने योग्य है।
(जैसे बच्चा तथा वृद्ध सर्व कार्य करने में समर्थ नहीं होते जवान व्यक्ति सर्व कार्य करने की क्षमता रखता है। ऐसे ही परब्रह्म-ब्रह्म व त्रिलोकी ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्य देवी-देवताओं को बच्चे तथा व्रत समझो इसलिए कबीर परमेश्वर को युवा की उपमा वेद में दी है।)
भावार्थ:- कविर्देव (कबीर परमेश्वर) तत्वज्ञान लेकर संसार में आता है। वह सर्वशक्तिमान है तथा काल (ब्रह्म) के कर्म रूपी किले को तोड़ने वाला है वह सर्व सुख दाता है तथा सर्व के पूजा करने योग्य हैं।
प्रमाण-3. ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 96 मंत्र 17-
अनुवाद:- पूर्ण परमात्मा (हर्य शिशुम) विलक्षण मनुष्य के बच्चे के रूप में जान-बूझकर प्रकट होता है तथा अपने तत्वज्ञान को उस समय निर्मलता के साथ उच्चारण करता है ।प्रभु प्राप्ति की लगी विरह अग्नि को वाले (मारुत) भक्त समूह के लिए (काव्येना) कविताओं द्वारा कवित्व से अत्यधिक वाणी निर्मलता के साथ(कविर गिर्भि) कविर्वाणी अर्थात कबीर वाणी द्वारा ऊंचे स्वर से संबोधन करके बोलता है, वह अमर पुरुष अर्थात सत्पुरुष ही संत अर्थात ऋषि रूप में स्वयं कबीर देव ही होता है। परंतु उस परमात्मा को न पहचान कर कवि कहने लग जाते हैं। परंतु वह पूर्ण परमात्मा ही होता है। उसका वास्तविक नाम कविर्देव (कबीर परमेश्वर) हैं।
भावार्थ:- ऋग्वेद मंडल न. 9 सूक्त नंबर 96 मंत्र 16 में कहां है कि आओ पूर्ण परमात्मा के वास्तविक नाम को जाने इस मंत्र 17 में उस परमात्मा का नाम व परिपूर्ण परिचय दिया है।वेद बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा विलक्षण मनुष्य के बच्चे के रूप में प्रकट होकर अपने वास्तविक ज्ञान को अपनी कबीर वाणी के द्वारा निर्मल ज्ञान अपने हंस आत्माओं अर्थात पुण्य आत्मा, अनुयायियों को कविताओं, लोकोक्तियों के द्वारा संबोधन करके अर्थात उच्चारण करके वर्णन करता है। इस तत्व ज्ञान के अभाव से उस समय प्रकट परमात्मा को नहीं पहचान कर केवल ऋषि व संत या कवि मान लेते हैं वह परमात्मा स्वयं भी कहता है कि मैं पूर्णब्रह्म हूं परंतु लोक वेद के आधार से परमात्मा को निराकार माने हुए प्रजाजन नहीं पहचानते जैसे गरीब दास जी महाराज ने काशी में प्रकट परमात्मा को पहचान कर उनकी महिमा कही तथा उस परमेश्वर द्वारा अपनी महिमा बताई थी उनका यथावत् वर्णन अपनी वाणी में किया।
भावार्थ:- ऋग्वेद मंडल न. 9 सूक्त नंबर 96 मंत्र 16 में कहां है कि आओ पूर्ण परमात्मा के वास्तविक नाम को जाने इस मंत्र 17 में उस परमात्मा का नाम व परिपूर्ण परिचय दिया है।वेद बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा विलक्षण मनुष्य के बच्चे के रूप में प्रकट होकर अपने वास्तविक ज्ञान को अपनी कबीर वाणी के द्वारा निर्मल ज्ञान अपने हंस आत्माओं अर्थात पुण्य आत्मा, अनुयायियों को कविताओं, लोकोक्तियों के द्वारा संबोधन करके अर्थात उच्चारण करके वर्णन करता है। इस तत्व ज्ञान के अभाव से उस समय प्रकट परमात्मा को नहीं पहचान कर केवल ऋषि व संत या कवि मान लेते हैं वह परमात्मा स्वयं भी कहता है कि मैं पूर्णब्रह्म हूं परंतु लोक वेद के आधार से परमात्मा को निराकार माने हुए प्रजाजन नहीं पहचानते जैसे गरीब दास जी महाराज ने काशी में प्रकट परमात्मा को पहचान कर उनकी महिमा कही तथा उस परमेश्वर द्वारा अपनी महिमा बताई थी उनका यथावत् वर्णन अपनी वाणी में किया।
गरीब, हे स्वामी सृष्टा मैं, सृष्टि हमारे तीर, दास गरीब अधर बसु।अविगत सत कबीर।।
प्रमाण- 4. अथर्ववेद कांड नंबर 4 अनुवाक नंबर 1 मंत्र नंबर 7-
अनुवाद:- अचल अर्थात अविनाशी जगतपिता भक्तों का वास्तविक साथी अर्थात आत्मा का आधार सबसे बड़ा स्वामी ज्ञान दाता जगतगुरु तथा विनम्र पुजारी अर्थात विधिवत साधक को सुरक्षा के साथ जो सतलोक जा चुके है उनको सतलोक ले जाने वाला सर्व ब्राह्मणों को रचने वाला काल की तरह धोखा ना देने वाले स्वभाव अर्थात गुणों वाला ज्यों का त्यों अर्थात वैसा ही वह आप (कविर्देव: कविर/देव:) कबीर परमेश्वर अर्थात कविर्देव है।
भावार्थ:- जिस परमेश्वर के विषय में कहा जाता है- त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव, त्वमेव विद्या च द्रवीणम, त्वमेव सर्वं मम देव देव।। वह जो अविनाशी सर्व का माता पिता तथा भाई व सखा व जगतगुरु रूप में सर्व को सत्य भक्ति प्रदान करके सतलोक ले जाने वाला काल की तरह धोखा न देने वाला सर्व ब्रह्मांड़ौ की रचना करने वाला कविर्देव (कबीर परमेश्वर) हैं।
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